राजा भरत :-----
पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना
'महाभारत' में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है।
राजा भरत को 'सर्वदमन' भी कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने
बचपन में ही बड़े-बड़े राक्षसों, दानवों और सिंहों का दमन
किया था। सम्राट भरत का शासन संपूर्ण भारतीय
उपमहाद्वीप पर था।
महाभारत के अनुसार भरत ने यमुना, सरस्वती और गंगा के तट पर बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान
किया तथा महर्षि भारद्वाज की कृपा से भूमन्यु नामक पुत्र प्राप्त किया। भरत के देहावसान के बाद
उसने अपने पुत्र वितथ को राज्य का भार सौंप दिया और स्वयं वन में चला गया।
श्रीमद् भागवत अनुसार भरत का विवाह विदर्भराज की तीन
कन्याओं से हुआ था जिनसे उन्हें तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई।
तीनों पुत्रों से कोई वंश चलता नहीं देख भारत ने 'मरूत्स्तोम'
यज्ञ किया। मरूद्गणों ने भरत को भारद्वाज नामक पुत्र दिया।
भारद्वाज का वंश चला।
इन्हीं भरत के कुल में शांतनु हुए। शांतनु की पत्नी गंगा के पुत्र
भीष्म थे और शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती के दो पुत्र हुए-
चित्रांगद और विचित्रवीर्य। भीष्म ने भीष्म प्रतिज्ञा ली थी
इसलिए उनका वंश नहीं चला। चित्रांगद तो गंधर्वों से युद्ध करते हुए मारा गया।
विचित्रवीर्य की दो पत्नियां अम्बिका और
अम्बालिका थीं। विचित्रवीर्य कामी और सुरापेयी था। उसे
राजयक्ष्मा हो गया और वह असमय में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।
सत्यवती और भीष्म को कुल और वंश नष्ट होने की चिंता होने
लगी तब सत्यवती ने राजमाता होने के कारण व्यास द्वैपायन
को बुलवाया, जो पुत्र दे सके। सत्यवती की कुमारी अवस्था में
ही व्यास द्वैपायन का जन्म हुआ था।
समागम के समय व्यास की कुरूपता को देखकर अम्बिका ने नेत्र मूंद लिए। अत: उसका
पुत्र धृतराष्ट्र जन्मांध पैदा हुआ।
अम्बालिका व्यास को देखकर पीतवर्णा हो गई, इससे उसका
पुत्र पाण्डु पीला हुआ। सत्यवती ने एक और पुत्र की कामना से
अम्बिका को व्यास के पास भेजा, लेकिन उसने अपनी दासी
को भेज दिया। दासी से विदुर का जन्म हुआ। इस तरह देखा जाए तो भरतवंश की जगह बाद में व्यास
द्वैपायन का वंश चला।
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